करवा चौथ
करवा चौथ :-
प्रति वर्ष कृष्ण और शुक्ल पक्षों में कुल मिला कर २४ गणेश चौथ होती है ! इनमे से कार्तिक वदी चौथ करवा चौथ और माघ वदी चौथ सकट चौथ कहलाती है !
नाम में क्या?
हिंदू धर्मं के सरे व्रत और त्यौहार किसी न किसी ज्योतिषीय कारणों के परणीत होते है तथा ज्योतिष ही इनका आधार है ! राशि चक्र के चार खाश बिन्दुओ या मोडो पर जब हमारी प्रथ्वी आती है तो उन कल खंडों में खाश पर्व मनाये जाते है !
उत्तरायण यानि मकर संक्रांति के पास सकट चौथ, मीनांत या वैसाखी के पास दमनक या गण-गौर , कर्क –सिह के पास हरियाली तीज और गणेश जयंती चौथ तथा तुला संक्रांति पर करक या करवा चौथ होती है| इन सब में गणेश जी का व्रत ,पूजा ,बडो का सम्मान और प्रत्यक्ष देवता चंद ,सूरज,हवा,जल आदि विश्वदेवो का नमन करने का विशेष महत्व है !
सुहाग रक्षा से सम्बन्ध :-
वास्तव में गणेश जी को शिव एवम पार्वती का सयुंक्त रूप कहा गया है! कारण, आप शिव पार्वती के पुत्र है तथा सभी जीवगण के ईश होने से आपका नाम सार्थक है !
अनादी काल से चले आ रहे सत्री पुरुष के आपसी रिश्ते को स्थायी और कल्याण कारक बनाने के लिए शादी व्याह के समय शिव पार्वती की तरह दो जीव एक देह या अर्धनारीश्वर स्वरुप होने का आशीष देने की हमारी परम्परा रही है !इन्ही का सयुक्त रूप होने से गणेश चौथ स्वयं सुहाग या पति के लंबे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन से जुड जाती है !
सामजिक महत्व :-
किंतु इस व्रत से जुडें बीते समय के सामाजिक कारण यह बताते हैं कि समय और धार्मिक परंपराओं के चलते करवा चौथ व्रत का स्वरुप और उद्देश्य पति की लंबी आयु और मंगल कामना के लिए व्रत पालन हो गया।
असल में बीते समय में कम उम्र की कन्याओं का विवाह कर दिया जाता था। वह अपने पिता और परिवार से दूर ससुराल जाती थी। आज की भांति तेज वाहन और संवाद की सुविधा न होने से लंबे समय तक उसका मेलजोल परिवारवालों से नहीं होता था। इधर ससुराल में अदब मर्यादाओं के कारण या
असल में बीते समय में कम उम्र की कन्याओं का विवाह कर दिया जाता था। वह अपने पिता और परिवार से दूर ससुराल जाती थी। आज की भांति तेज वाहन और संवाद की सुविधा न होने से लंबे समय तक उसका मेलजोल परिवारवालों से नहीं होता था। इधर ससुराल में अदब मर्यादाओं के कारण या
परिवार के सदस्यों खासतौर पर पुरुष सदस्यों के साथ बोल, व्यवहार में वह असहज होती थी।
इसलिए करवा चौथ के दिन सामाजिक रस्म के तहत गांव की ऐसी हमउम्र विवाहित महिला को उस नवविवाहिता की धर्म बहन या कंगन सहेली बनाया जाता था, जिसका ससुराल से सगे रिश्ते नहीं होते थे। यह भावनात्मक रिश्ता दोनों ही विवाहिताओं के लिए ससुराल के जीवन को सहज और सुखद कर देता था। क्योंकि नवविवाहिता, धर्मबहन के माध्यम से अपनी हर बात और समस्या को पति या ससुरालवालों तक पहुंचा देती थी। दोनों एक-दूसरे से सगी बहन का रिश्ता निभाती थी। हर रस्म-रिवाज चाहे धार्मिक और व्यावहारिक वह साथ होती थी। धर्मबहन के साथ ससुराल और पीहर दोनों ही परिवार सगा रिश्ता ही मानते थे।
इस तरह वास्तव में करवा चौथ के मूल में दोस्ती के उत्सव का भाव है। बाद में धार्मिक मान्यताओं और प्रसंगवश पतिव्रत की परंपरा जुड़ गई। किंतु अगर देखा जाए तो दोनों ही स्थितियों में पति की भूमिका अहम है। क्योंकि पहली मान्यता में धर्मबहन या सहेली बनाने की प्रथा भी विवाहित होने पर ही निभाई जाती थी तो दूसरी परंपरा में भी विवाहित स्त्री ही पति की मौजूदगी में अखण्ड सौभाग्य के लिए व्रत पालन करती है।
इसलिए करवा चौथ के दिन सामाजिक रस्म के तहत गांव की ऐसी हमउम्र विवाहित महिला को उस नवविवाहिता की धर्म बहन या कंगन सहेली बनाया जाता था, जिसका ससुराल से सगे रिश्ते नहीं होते थे। यह भावनात्मक रिश्ता दोनों ही विवाहिताओं के लिए ससुराल के जीवन को सहज और सुखद कर देता था। क्योंकि नवविवाहिता, धर्मबहन के माध्यम से अपनी हर बात और समस्या को पति या ससुरालवालों तक पहुंचा देती थी। दोनों एक-दूसरे से सगी बहन का रिश्ता निभाती थी। हर रस्म-रिवाज चाहे धार्मिक और व्यावहारिक वह साथ होती थी। धर्मबहन के साथ ससुराल और पीहर दोनों ही परिवार सगा रिश्ता ही मानते थे।
इस तरह वास्तव में करवा चौथ के मूल में दोस्ती के उत्सव का भाव है। बाद में धार्मिक मान्यताओं और प्रसंगवश पतिव्रत की परंपरा जुड़ गई। किंतु अगर देखा जाए तो दोनों ही स्थितियों में पति की भूमिका अहम है। क्योंकि पहली मान्यता में धर्मबहन या सहेली बनाने की प्रथा भी विवाहित होने पर ही निभाई जाती थी तो दूसरी परंपरा में भी विवाहित स्त्री ही पति की मौजूदगी में अखण्ड सौभाग्य के लिए व्रत पालन करती है।
संदेश यही है कि यह व्रत पति के प्रति सम्मान प्रगट करने का प्रतीक पर्व है। पति-पत्नी दोनों एक गाड़ी के दो पहियों की तरह होते हैं। दोनों एक समान, एक दिशा में चलते हैं तो जिस तरह गाड़ी आगे की ओर बढ़ती है, उसी तरह गृहस्थी की गाड़ी भी अपने सही लक्ष्य की ओर बढ़े। पत्नी अपने पति के प्रति प्रेम, समर्पण व विनम्र भाव से रहे। मर्यादा से रहे, गृहस्थी के अनुशासन से रहे। पति भी अपने कर्तव्य का पालन करे।
चूंकि गृहस्थी की जिम्मेदारियों को निभाते हुए गलतियां होना स्वाभाविक हैं। शास्त्रों में भी कहा गया है कि अपनी गलती, दोषों को सुधार लेना ही बडप्पन है। इसलिए इस व्रत पर अपनों और बड़ों के सम्मान करने और पति के प्रति समर्पण भाव का संकल्प लें। पति-पत्नी दोनों ही अपने दोषों को याद कर इसी भाव से उत्सव मनाएं कि गलतियां फिर न होंगी। स्त्री के लिए सास, ससुर और पति के चरणस्पर्श इसी भाव का प्रगटीकरण है।
गणेश पूजन ? :-
वैदिक साहित्य में वर्णित बारह आदित्य ,ग्यारह रूद्र,आठ वासु और दो असवानी कुमार मिलकर तैतीस देवता मने जाते है !ये ही मुख्या देव गण है !यदि और गहराई में चले तो दस विश्वदेव ,छत्तीस तुषित,चौसठ अभासुर,उनचास वायु और दो सो चौबीस महाराजिक मिलकर कुल चार सो बारह गण यनि समूह देवताओ के स्वामी गणेश है !
करवा नाम क्यूँ ?
करक संस्कृत शब्द का अर्थ है करवा यानि अर्घ्य पात्र ! करक में साक्षात् देव चंद्र को अर्घ्य हेतु जल रखले के कारण आम जनता इसे करक चतुर्दशी या करवा चौथ कहते है !सिंदूर गणेश जी का गहना है ,अतः सुहाग कि निशानी माना गया है! इनके सर पर बल चंद्र है, अतः उगते चंद को देख कर व्रत खोलने का नियम है!
||श्री गणेशाय नमः ||
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