NAVARATRI KYUN ??

   भारत वर्ष त्योहारों और रस रंग का देश है ! मगर, यह सप्ष्ठ होना अयाश्यक है की ऐसा क्यूँ है की भारत में इतने तीज त्यौहार मनाये जाते है ! नवरात्रि तो विशेषतया, इन त्योहारों के मौसम का आरंभ   है ! इसका बहुत साधारण सा उत्तर है की हमारे ऋषि मुनियों ने समय की अवधारणा को अच्छे ढंग से समझा था , और , यहाँ  तक की समय का आकलन विभिन्न ग्रहों के संधर्भ में भी सही सही किया था !
इसी प्रकार मनुष्य  और  देवताओं के समय काल  का अंतर भी हमारे ऋषि मुनिओं ने ठीक प्रकार से समझा था ! दरअसल , देवताओ और मनुष्य के इसी समय के  अंतर  से सारी श्रष्टि चलायमान है !                                                          प्रथ्वी  पर होने वाला एक वर्ष देवताओं का एक अहोरात्रि यानि दिन + रात होता   है, ऋषि मुनिओं ने समय के मिलन काल  का विशेष महत्व बताया है ! इसी लिए संध्या वंदन का  प्रावधान किया गया  है, वास्तव में संध्या संधि धातु से बना है ! जिसका अर्थ समय के जोड़ से है ! अर्थात संध्या वह समय है जब दो काल आपस में मिल रहे हो ! इस प्रकार हमारे एक दिन रात में चार संध्याएँ होती है ! प्रातः, माध्यान , शायं, और रात्रि जिनमें से दो संध्याएँ  प्रातः और शायं विशेष महत्व पूर्ण है !
उपरोक्त संध्या कल को यदि हम  देवताओ के समय चक्र पर देखें तो पता चलता है की देवताओ का प्रातः काल मेष संक्रांति पर , माध्यान काल  कर्क संक्रांति पर, शायं  तुला संक्रांति पर और रात्रि मकर संक्रांति पर होती है  ! यद्यपि समय चक्र की सभी  संक्रांतियां महवपूर्ण हैं मगर इन चार संक्रांतियो  का विशेष महत्व है ! अतः इन सन्क्रन्तिओ के समय काल को मनुष्य देवताओ के साथ संध्या वंदन करता है ! कुल चार नवरात्र इसी आधार पर बने है जिनमे से दो यानि कर्क और मकर सन्क्रन्तिओन को 






गुप्त नवरात्री तथा अन्य पूर्ण नवरात्री है १
आश्चर्य  जनक पर सत्य है की मौसम की  परिवर्तन  का आधार  भी यही चक्र है और हम देवताओ की दिनचर्या  के साथ अपने आप को नयमित करने की कोशिश करते है  शायद इसी लिया हमने अपने जीवन को विभिन्न उत्सवों  से भर दिया है ! चैत्र नवरात्रि के बाद प्रातः काल  के उत्सव और त्यौहार जिनमे अधिकतर प्रातः काल के या किसी नवीन आरम्भ के उल्लास से परिपूर्ण उत्सवों  का आनंद होता है !
मौसम के परिवर्तन पर शारीरिक परिवर्तन भी आवश्यक है अतः आने वाले मौसम के अनुरूप स्वयं को तैयार करने की कोशिश में नवरात्री का उत्सव होता है ! 
 देवी दुर्गा के उत्पति भी इसी समय की गयी है सपष्ट है की देवताओं ने देवी की उत्पति अपनी  शक्तियों  से की थी   तथा  देवी को उत्पन्न कराने की आवश्यकता इसलिए पड़ी  होगी   क्यूंकि शायं काल का  प्रारभ ही निश्चारी और आसुरी शकितों के क्रियान्वन का समय है : अतः देव असुर संग्राम और शक्ति की उत्पति का समय भी तर्क सांगत प्रतीत होता है !
आईये हम सब मिलकर इन सभी आसुरी शक्तिओं को विनाश करने वाली मां दुर्गा का सानिध्य प्राप्त करे और शरद ऋतू  के  दुष्प्रभावों से अपने आपको को बचाएं ! जय माँ विन्ध्यावाशिनिं     navratri

Comments

  1. भावपूर्ण विवेचन। चिंतन धारा को नई सोच की ओर ले जाने के साधुवाद। वो पाठक जो गंभीर चिंतन मे चित्त नहीं लगाते यदि एक पाठन करेंगे तो वो बारीकियों से अपने को भली भांति जोड़ पाएंगे। बधाई आशीर्वाद। Bhola Nath Shukla 11/211 Souterganj kanpur 208001 bnshukla05@gmail.com

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